गाया है नुसरत फतेह अली खाँ ने। लिखा है जावेद अख़्तर ने। गीतायन पर खोजें

असल में

हुस्ने जानाँ की तारीफ़ मुमकिन नहीं...

रमण कौल ने जैसा सुना/समझा
उसने जाना कि तारीफ़ मुमकिन नहीं...

बकौल रमण कौल,
मैंने तो सही सुना था, पर किसी और ने फेसबुक पर ऐसा लिखा था
मज़ेदार है!
अरे! मैंने भी यही समझा था!


चर्चा

आपकी बात

आपका नाम

7 + 2 =


सर्वाधिकार सुरक्षित © 2005 विनय जैन